बीज मंत्रों से उपचार -<br /><br />खं – हार्ट-टैक कभी नही होता है | हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही होता | ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है |<br /><br />कां – पेट सम्बन्धी कोई भी विकार और विशेष रूप से आंतों की सूजन में लाभकारी।<br /> <br />गुं – मलाशय और मूत्र सम्बन्धी रोगों में उपयोगी। <br /><br />शं – वाणी दोष, स्वप्न दोष, महिलाओं में गर्भाशय सम्बन्धी विकार औेर हर्निया आदि रोगों में उपयोगी ।<br /><br />घं – काम वासना को नियंत्रित करने वाला और मारण-मोहन-उच्चाटन आदि के दुष्प्रभाव के कारण जनित रोग-विकार को शांत करने में सहायक।<br /><br />ढं – मानसिक शांति देने में सहायक। अप्राकृतिक विपदाओं जैसे मारण, स्तम्भन आदि प्रयोगों से उत्पन्न हुए विकारों में उपयोगी।<br /><br />पं – फेफड़ों के रोग जैसे टी.बी., अस्थमा, श्वास रोग आदि के लिए गुणकारी।<br /><br />बं – शूगर, वमन, कफ, विकार, जोडों के दर्द आदि में सहायक।<br /><br />यं – बच्चों के चंचल मन के एकाग्र करने में अत्यत सहायक।<br /><br />रं – उदर विकार, शरीर में पित्त जनित रोग, ज्वर आदि में उपयोगी।<br /><br />लं – महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म, उनके अनेक गुप्त रोग तथा विशेष रूप से आलस्य को दूर करने में उपयोगी।<br /><br />मं – महिलाओं में स्तन सम्बन्धी विकारों में सहायक।<br /><br />धं – तनाव से मुक्ति के लिए मानसिक संत्रास दूर करने में उपयोगी ।<br /><br />ऐं – वात नाशक, रक्त चाप, रक्त में कोलेस्ट्राॅल, मूर्छा आदि असाध्य रोगों में सहायक।<br /><br />द्वां – कान के समस्त रोगों में सहायक।<br /><br />ह्रीं – कफ विकार जनित रोगों में सहायक।<br /><br />ऐं – पित्त जनित रोगों में उपयोगी।<br /><br />वं – वात जनित रोगों में उपयोगी।<br /><br />शुं – आंतों के विकार तथा पेट संबंधी अनेक रोगों में सहायक ।<br /><br />हुं – यह बीज एक प्रबल एन्टीबॉयटिक सिद्ध होता है। गाल ब्लैडर, अपच, लिकोरिया आदि रोगों में उपयोगी।<br /><br />अं – पथरी, बच्चों के कमजोर मसाने, पेट की जलन, मानसिक शान्ति आदि में सहायक इस बीज का सतत जप करने से शरीर में शक्ति का संचार उत्पन्न होता है।
